Thursday, 21 August 2014

बदलाव की करवट-

मिनट वक़्त बदलता है,मूड बदलता है और इंसान की फितरत तो चुटकियों में बदल जाती है। इंसान जुडी हर चीज़ में समय के साथ बदलाव आ जाता है या  लाना पढता है। पहले के पिताजी आज पापा से डैड बन गए,मेल कम और ई-मेल ज़्यादा हो गए, ओ. के. ए. व्हाई (ओके) बेचारा के बन गया,(यू ) में व्हाई और ओ मर गए बस यू रह गया।
वैसे मुझ में भी काफी बदलाव आएँ हैं पहले मुझे लगता था बिल्ली रास्ता काट गयी तो अशुभ होगा पर आब सोचती हूँ अगर आप बिल्ली का रास्ता काट जाएँ तो?पर बिल्ली इतना कहाँ सोचती है भई? चलते हैं वैसे वो भी चलती है, उसके जाने का मतलब रास्ता कट जाना कतई नहीं है। किसी से मैंने यह भी सुना था की घर में मनी प्लांट लगाने पर धन की वर्षा होगी। इन अन्धविश्वासों फायदा मार्केट को बहुत मिलता है। सबसे अहम है टी.वी में दिखाया जाने वाला धन वर्षा यंत्र। धन वर्षा करने वाला यह यंत्र असरदार तो होते हैं सच,मैंने खुद इसे ख़रीदा है। यह यंत्र सौ प्रतिशत आपके घर वर्षा  हैं पर शर्त यह है की आप इसे बनाकर बेचें। दादी इन्हीं बातों से खीज  जाती हैं और मुझे बदल जाने का  ताना सुनाती हैं,खैर मेरी सोच बदल जाने से समाज कहाँ बदलने वाला है।
कुछ ही दिन पहले भारत ने ६८ वा स्वतंत्र्ता दिवस मनाया पर इतने सालों में हालात नकारात्मकता  तरफ ही बदलते जा रहे हैं,रेप केस तो घटने के बजाए बढ़ते ही जा रहे हैं। हम व्हाट्सऐप पर झंडे को अपनी डी.पी समझते हैं हम बदल गए हैं? तो ऐसा नहीं हैं दोस्तों।बड़े-बड़े नेता ऐसे संघीन मुद्दों पर अपने तीखे बाण चलाते हैं  कहते हैं की हम बहुत शर्मिन्दा हैं,मैं जानना चाहूंगी कि वह कैसे शर्मिन्दा हुए? खुद को अमीरों की सूची में सबसे सर्वश्रेस्ठ बताते हैं पर अगर इन्कम टैक्स भरने की बात आए  तो यह लोग गरीबों की सूची में जुड़ना भी उनकी शान के खिलाफ नहीं होगा।
इस तरह के सामाजिक बदलाव के अलावा दुनिया में ऐसा बहुत कुछ है  बदलता रहा है,आब आप  फिल्मों को ही ले लीजिये। पहले की फिल्मों में एक माँ के दो-तीन बेटे होते थे पर आज की फिल्मों में एक हीरो की दो-तीन माँऐं होती हैं। रील लाइफ़ के साथ-साथ रियल लाइफ़ में भी हीरो की माँ की मिस्ट्री बानी रहती है।
अब अगर हम बात करें इंसान के शरीर की तो हमें पता चलेगा की पहले के समय से हमारा शरीर भी कितना बदल गया है। पहले इंसान को केवल टी.बी,मलेरिया,निमोनिया जैसी बीमारियां होती थीं, पर इन सब की जगह फोबिया यानी की एक तरह के दर ने ले ली है। एग्जाम फोबिया,वाटर फोबिया,हाइट फोबिया जिससे इंसान जीने कम और डरने ज़्यादा लगा है।
एक फोबिया जो इन दिनों सबसे ज़्यादा पाया जाता है वह है "डॉटरस मैरिज फोबिया",शादी का प्रचलन पहले से काफी बदल गया है,बेरहाल कुछ चीज़े सुधरने की बजाए और बिगड़ गयीं हैं। "डॉटरस मैरिज फोबिया" जैसी बीमारी के बारे में मेडिकल में कहीं उल्लेख नहीं है,यह तो  नाम है।
हर लड़की के माता-पिता को होने वाली यह बीमारी जानलेवा तो नहीं है पर इससे मरीज़ चैन से जी नहीं पता।इस बीमारी के कारण माता-पिता का एकमात्र लक्ष्य होता है किसी तरह बेटी के हाथ पीले हो जाएँ। इस सोच में बदलाव की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। एक कहावत के अनुसार "लड़की की डोली और मुर्दे की अर्थी जितना जल्दी उठ जाए उतना अच्छा है"। अर्थी वाली बात तो समझ आती है लड़की की डोली को अर्थी से तुलना करना कहाँ तक उचित है? शर्म नहीं आती लोगों को ऐसा कहते हुए? क्या एक लड़की केवल एक बोझ है  भावनाएं नहीं हैं? मेरे हिसाब से तो वही असली शादी होगी जहाँ बिना दहेज के शादी हो रही हो,जहाँ शादी बिना साज-सज्जा के दिन के उजाले में हो रही हो और जहाँ विवाह के लिए ज़मीन,ज़ेवर गिरवी न रखे जा रहे हों। अगर यह छोटे-छोटे बदलाव जाएँ तो बेटियां कभी किसी पिता पर बोझ नहीं रहेंगी।हम पूरे देश को बदलने पर बहस करें उससे बेहतर है बदलाव की पहली सीढ़ी हमारे घरों से ही बनाई जाए।

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