Sunday, 8 March 2015

समाज का चश्मा लैंन्स में औरत -

माँ कहाँ हो? जल्दी खाना लाओ?
बहरी हो गई हो क्या मेरे जूते कहाँ हैं ?
काम भी कर लिया कर महारानी, दिन भर पड़ी क्यों रहती है?
दहेज तो लाई नहीं कम से कम सास की सेवा तो किया कर?
खा-खा कर मोटी हो गयी है, लड़कियों को कम खाना चाहिए पता नहीं है क्या ?
तेरी सूरत इतनी काली है,तुझसे शादी कौन करेगा ?
मनहूस तुझे मेरे ही घर पैदा होना था?
अपना रास्ता नाप ले, टाईमपास है तो,तेरे साथ कैसे रहूँगा?
                                          बहू घूँघट करके बैठा करो,माँ ने कुछ सीखा के नहीं भेजा?
                                          घर के काम किया कर, तू पढ़-लिखकर क्या करेगी?
                                          बस इतने सवाल करने के बाद समाज कहता है "हैप्पी वूमेनस डे",समाज का                                                   चश्मा और लैंन्स में औरत। 

Friday, 6 March 2015

मौसम मेरा गुलाल वाला-

गुजिया बनाते-बनाते अंजली के हाथ रुक से गए थे। गुजिया की मिठास से ज़्यादा कड़वी उसके मन की आस थी,जो कहीं अनसुनी सी रह गई थी। शादी के बाद यह उसकी पहली होली शायद वाक़ई पहली ऐसी होली थी जिस पर अंजली के गाल गुलाल से भी खिल न पाए। माँ के उस फ़ोन ने उसे कितना बेबस बना दिया था जिस पर सास और देवरनियों ने जमकर ताना कसा था,की यह पहली बहू देखी है जो शादी के बाद पहली होली पर मायके जाना चाहती है। माँ की तबीयत कितनी ख़राब थी तब भी वह यह न कह सकीं की मिलने को जी चाहता है,पता नहीं फिर कभी तुझे देखने का मौका मिले न मिले,बस यही बोलकर माँ ने फ़ोन काटा की तुझे अपने घर को खुशियों की मिठास से भरकर रखना और मेरी चिंता मत करना।
भरे मन से गुजिया थाल में सजाई और बाहर आकर देखा की राकेश कुछ उधेड़-बुन में है,अंजली  ने पूछा "क्या ढूँढ रहे हो?" राकेश बोला "मैं तुम्हें ही ढूँढ रहा था , बैग तैयार है?" अंजली समझ पाती इससे पहले राकेश ने अंदर से उसका बैग ला दिया और बोला "बैठो कार में जल्दी से , कानपुर की ट्रेन एक घंटे बाद है , माँ के घर नहीं जाना? अंजली ने भरे मन से राकेश को गले लगा लिया और सोचा अब आया है "मौसम मेरा गुलाल वाला।