Tuesday, 29 July 2014

Friendship Day Special-

My makeover friend- 
 
I remember a incident during my annual function when I forgot to carry my bag in which I had kept my makeup kit,as I reached school I realised that my bag is missing.I started crying.Suddenly my classmate noticed me and told me to follow him.He gave me his hanky to wipe my tears and took me to a shop outside the campus and purchased a makeup kit for me,I was speechless with this attitude of him towards me.I thanked and told him to be connected with me forever.From that day we became best buddies and today he is one without him my life is incomplete.

My Friend-Inseparable Part Of Me
 
On this freindship day I would like to remind myself 3 years back when I was in class 11th and my marks were falling down and I was not able to manage my studies at all and one day my maths teacher took a class test,I copied all the answers from the notebook of a girl sitting besides me.After the exam she stood and goes
straight away towards my teacher and told her everything about my deed.I was very angry with this act of her,she came and told me that whatever I had done is for your sake.I told our teacher that we both cheated and I requested her to take our retest.I was shocked with her kindness towards me,if she had spoken only about me then the teacher would never take my exam again instead she must had scolded me.On that day I realised the importance of a true friend.After that incident we both are tied into a friendship knot.And today she is a inseparable part of my life.We are in two different cities but distance never divides our bond of friendship.

Monday, 28 July 2014

खुशियों की सौगात-ईद 


पूरे महीने इंतज़ार करने के बाद ईद का त्योहार आ ही गया। आज चाँद दिखने पर कल ईद मनाई जाएगी। ऐसे में राजधानी ईद की तैयारियों में व्यस्त दिखी। अमीनाबाद,नजीराबाद आदि जगहों पर लोगों ने जमकर शॉपिंग का लुफ्त उठाया। वैसे तो ईद का पर्व पूरी दुनिया मनाती है पर मुसलमानों के लिए यह पर्व बेहद खास होता है। सेवईयों में लिपटी मोहब्बत की मिठास का त्यौहार ईद ,भूख-प्यास सहन करके एक महीने तक सिर्फ खुदा को याद करने वाले रोजेदारों के लिए अल्लाह का इनाम माना जाता है। अमीनाबाद में रहने वाली असीम शेख बताती हैं की ईद का त्योहार भाईचारा बढ़ाता है,सेवईयाँ और मिठाईयों से पर्व की मिठास दुगनी हो जाती है। असीम पुराने दिनों को याद करके कहती हैं "आजकल की व्यस्त दिनचर्या को देखते हुए मुझे बचपन की ईद याद आती है जब पूरा परिवार एक साथ मिलकर ईद मनाता था अब तो यह मुमकिन नही हो पाता केवल फोन और इंटरनेट से ही बधाईयाँ दी जाती हैं, इस दिन “ईदी” देने का रिवाज है। हर बड़ा अपने से छोटे को कुछ रुपए देता है, इसी रकम को ईदी कहते हैं जिसे आजकल ऑनलाइन गिफ्ट की रूप में भी दिया जाने लगा है" वहीं दूसरी तरफ शबाना खान का कहना है " बदलते वक़्त के साथ उनका ईद मनाने का तरीका नहीं बदला। किसी और मौके पर भले ही मिलना जुलना न हो पर ईद पर पूरा परिवार लखनऊ आकर एक साथ ईद मनाता है। रमजान महीने में रोजे रखने से आत्मा पवित्र होती है और नर्क से मुक्ति मिलती है। इसी खुशी में 'ईद' का त्योहार मनाया जाता है। ईद के दौरान बढ़िया खाने के साथ नए कपड़े भी पहने जाते हैं और परिवार और दोस्तों के बीच तोहफ़ों का आदान-प्रदान होता है।" इसी तरह यह ईद कई और लोगों की जीवन में खुशियाँ लेकर आएगी। फिलहाल ईद की तैयारियाँ पूरे उत्साह की साथ शुरू हो चुकी हैं बस चाँद का इंतज़ार है।

Friday, 25 July 2014


बिना  मिले  ही  हुआ  प्यार -

मेरा पहला-पहला प्यार मेरे  लिए  बहुत  खास  है, उस  वक़्त  मैं दसवी में पढ़ती थी। जब भी मैं उसे  देखती  थी  मन  खुश  हो  जाता था, मन  करता  था  पूरे दिन उसके  साथ  टाइम  स्पेंड  करुँ। उसको  देखकर  लगता  था  की  वो   बस  मेरे  लिए  ही  बना है। उसकी  आवाज़  सुनकर  मेरे  दिल  में  घंटियाँ  बजने  लगती  थी। बिना मिले  ही प्यार होने लगा था। मैं मम्मी पापा  को  बताने  से  डरती थी इसलिए मैंने  खुद  ही  हिम्मत  करके  उसके  पास  जाने  की  सोची। वह  मेरे  घर  के  बगल में रहता  था। आंटी  जब  भी  सुबह-सुबह घर  से  निकलती  तो  उसे साथ  लेकर  जाती थी, तभी  मैं  उसे  बालकनी  से  देखा  करती  थी, आज  हिम्मत  करके  मैं  आंटी  के   पास  गई  और  उनसे  रिक्वेस्ट  करके  मुझे  अपने  क्रश से  मिलने  के  मौका  मिला। मेरा  पहला  क्रश  तो  बस  उनका  वो  मोबाइल  था  जो  अब   मेरे  हाथों  में  था। उसकी  स्लिम बॉडी  और  कलर  देखकर  मैं  पहले  दिन  ही  उसे  पसंद  करने  लगी  थी। सफ़ेद  रंग  के   मोबइल पर  लाल  कवर  बहुत जम रहा  था। कुछ  भी  कहो  वो  वाकई  तारीफ के लायक  था। बस  आंटी  का  वो  मोबाइल  ही  मेरी  लाइफ  का  पहला  पहला  प्यार  था।

Wednesday, 16 July 2014





"वृद्धाश्रम में अपनों से बिछुड़ने के अलावा कोई तकलीफ नहीं हमें........"



"बच्चों के साथ हमारी सोच का गैप बहुत अधिक है", यह कहना है वृद्धाश्रम में रहने वाले एक सज्जन का। ९० वर्ष के टी.एन त्रिपाठीजी अपनी पत्नी के साथ पिछले ढाई सालों से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। अपना जीवन वृतांत याद करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी पहली तनख़्वाह आज एक रुपए के बराबर है। इतनी थोड़ी रकम में उन्होंने बच्चों के साथ पूरा घर भी सँभाला। इससे ज़्यादा वेतन तो आज किसी सफाई कर्मचारी को मिलते हैं, वृद्धाश्रम में अपनों से बिछुड़ने के अलावा कोई तकलीफ नहीं हमें।
त्रिपाठीजी के मुताबिक पेरेंट्स बच्चों से यह आशा रखते हैं कि बच्चे माँ-बाप का सहारा बने ताकि मुसीबत के वक़्त उन्हें अकेला महसूस न हो। उदाहरण के तौर पर उन्होंने अपना एक किस्सा बताया, जब वो अपनी पत्नी के साथ मेडिकल कॉलेज गए थे इलाज करवाने तब वहाँ उन्हें नंबर की पर्ची तो मिल गई परन्तु अस्पताल में ऊपर-नीचे भागदौड़ करना उनके लिए नामुमकिन था इसलिए वे केवल पानी पीकर वापस लौट आए। ऐसे में अगर उनके साथ कोई नौजवान होता तो शायद उन्हें इतनी कठनाई नहीं होती। इसी के साथ उन्होंने बच्चों और पेरेंट्स के लिए सलाह दी की रिश्ते परस्पर सहयोग से बनते हैं। दोनों को ही एक दूसरे की ज़रूरत होती है इसलिए एक दूसरे का महत्व समझना बहुत ज़रूरी है।



उसी वृद्धाश्रम में पिछले पाँच महीने से रह रही एक बंगाली महिला, कमला बोराल का आत्मविश्वास सराहने योग्य था। कई सालों से वह एक स्कूल को अकेले सँभाल रहीं थीं। विवाहित न होने के बावजूद भी कमला जी घर परिवार की अहमियत अच्छी तरह जानती हैं। उम्र के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उन्होंने वृद्धाश्रम में रहने का फैसला किया। अकेले जीवन जीने की हिम्मत रखने का उनका यह साहस उल्लेखनीय है।


-यशस्वी माथुर