"बच्चों के साथ हमारी सोच का गैप बहुत अधिक है", यह
कहना है वृद्धाश्रम में रहने वाले एक सज्जन का। ९० वर्ष के टी.एन त्रिपाठीजी अपनी
पत्नी के साथ पिछले ढाई सालों से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। अपना जीवन वृतांत याद
करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी पहली तनख़्वाह आज एक रुपए के बराबर है। इतनी थोड़ी रकम में उन्होंने बच्चों के साथ
पूरा घर भी सँभाला। “इससे ज़्यादा वेतन तो आज किसी सफाई कर्मचारी को मिलते हैं, वृद्धाश्रम
में अपनों से बिछुड़ने के अलावा कोई तकलीफ नहीं हमें।”
त्रिपाठीजी के मुताबिक पेरेंट्स बच्चों
से यह आशा रखते हैं कि बच्चे माँ-बाप का सहारा बने ताकि मुसीबत के वक़्त उन्हें
अकेला महसूस न हो। उदाहरण के तौर पर उन्होंने अपना एक किस्सा बताया, जब
वो अपनी पत्नी के साथ मेडिकल कॉलेज गए थे इलाज करवाने तब वहाँ उन्हें नंबर की
पर्ची तो मिल गई परन्तु अस्पताल में ऊपर-नीचे भागदौड़ करना उनके लिए नामुमकिन था
इसलिए वे केवल पानी पीकर वापस लौट आए। ऐसे में अगर उनके साथ कोई नौजवान होता तो
शायद उन्हें इतनी कठनाई नहीं होती। इसी के साथ उन्होंने बच्चों और पेरेंट्स के लिए
सलाह दी की रिश्ते परस्पर सहयोग से बनते हैं। दोनों को ही एक दूसरे की ज़रूरत होती
है इसलिए एक दूसरे का महत्व समझना बहुत ज़रूरी है।

उसी वृद्धाश्रम में पिछले पाँच महीने
से रह रही एक बंगाली महिला, कमला बोराल का आत्मविश्वास सराहने
योग्य था। कई सालों से वह एक स्कूल को अकेले सँभाल रहीं थीं। विवाहित न होने के
बावजूद भी कमला जी घर परिवार की अहमियत अच्छी तरह जानती हैं। उम्र के साथ
स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उन्होंने वृद्धाश्रम में रहने का फैसला किया। अकेले
जीवन जीने की हिम्मत रखने का उनका यह साहस उल्लेखनीय है।
-यशस्वी माथुर

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