Sunday, 15 June 2014




सूखे पत्ते की व्यथा







दुनिया में इंसान एक कच्चे फल की तरह आता है जो हर तरह के मौसम और परिस्थितियों को झेलते हुए पूरी तरह पकता है. उस फल को पकने की परिस्थितियाँ ही उसे असली स्वाद देती हैं. बिना मौसम, गर्मी, बरसात झेले फल कभी पक नहीं सकता. इंसानी फितरत भी कुछ यही हाल बयां करती है. हम अपने गुरु, माता-पिता, मित्रों की सहायता के बिना आगे नहीं बढ सकते और जब हम कामयाबी हासिल कर लेते हैं तो उन सभी हाथों को भूल जाते हैं जिनने अपनी ऊँगली पकड़ के हमें चलना सीखाया है. एक पद की कामयाबी इंसान को अँधा बना देती है. अपने से छोटे पद के इंसान उसे सूखे पत्ते से कम नहीं लगते. उन्हें नीचा दिखाने में ही उसे सर्वोत्तम सुख प्राप्त होता है. पर ऐसी कामयाबी का क्या फायदा जिसमें तुम्हे दुआ भी नसीब न हो, क्यों हम भूल जाते हैं की कभी हम भी उसी अवस्था से होकर गुज़रे थे जहाँ अब कोई और खड़ा है, उस वक़्त यदि तुम्हारे साथ ये सुलूक होता तो क्या तुम बर्दाश करते? उन सभी बड़े लोगों की मेहनत को मेरा सलाम और उनसे यही गुज़ारिश करूंगी की अपनों से छोटे पद के लोगों को सम्मान दीजिये,गाड़ी एक पहिये से नहीं चलती. एक जुट होकर काम करने में ही असली सफलता है.

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