ईश्वर का बाज़ार-
कपड़ों,गहनों के बाज़ार
के आलावा भगवान
का बाज़ार भी
खूब तरक्की करता
है. लोग मंदिर,
दरगा,गिरजाघर में
जाने के लिए
अनेक सामग्री खरीदते
हैं. इस दिखावे
के मायाजाल में
लाखों-करोंड़ों लोग
फँसते हैं. श्रद्धा और अंधविश्वास
में यही अंतर
है. हम यह
नहीं सोचते कि
जो फूल,माला,मोमबत्ती,चादर हम
ईश्वर को समर्पित
करते हैं उसका
आखिर होता क्या
है. वो बाद
में महज़ मूर्तियों
के श्रंगार में
काम आती है,
फिर उसे फेंक
दिया जाता है.
खुदा को अंतरआत्मा
में सजाया जाता
है न कि
पुष्पों से.वैसे
अंधविश्वास की जड़े अपनों के मामले में थोड़ी
और मज़बूत हो जाती हैं. हम अपने सगे-संबंधियों के मोह की खातिर इस तरह की दकियानूसी
बातों में आ जातें हैं. भगवान अच्छे कर्मों में होते हैं.पूरे दिन गलत काम करके पूजा-पाठ
करने से पाप नहीं धुलते,हाथों की लकीरें हम खुद बनाते हैं. अपनी मेहनत पर ध्यान केन्द्रित
करके सफलता की ओर बढ़ते जाइए,खुदा आपको जरूर मिलेंगे.

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