Saturday, 21 February 2015

सरल जीवन,आसान रिश्ते


कभी मैं ज़िंदगी के आईने से अपने आस-पास देखती हूँ तो महसूस करती हूँ कुछ बदल सा गया है, मुझे शिकायत है कड़वे तेल से जो मीठी चाशनी को बेकार कर देता है। जब मैं छोटी थी तो दादी को पुराने गानों की कैसेट लाकर देती थी, और बदले में दादी मुझे कहानियाँ सुनाती थीं। मालगुडी डेज़ की कहानियाँ ,शेखचिल्ली की कहानियाँ। पर अब किसके पास इतना वक़्त है , न मैं कहानियों के लिए वक़्त निकाल पाती हूँ और न दादी को अब सास-बहू सीरीयल से फ़ुर्सत मिलती है।
एक वक़्त था जब मैं सुकून से मौसी के घर भोपाल जाया करती थी। मम्मी मुझे रास्ते भर घर का ऐड्रस रटवा देती थीं तीसरी गली, न्यू मार्केट रोड। हबीबगंज स्टेशन पर उतरते ही गरम -गरम जलेबी और पोहे की खुशबू आने लगती थी, पर अब तो वहाँ कूड़े का वास है। स्टेशन से मौसी के घर तक का मेरा सफ़र पेड़ों को गिनने में जाता था। अनगिनत पेड़ और असंख्य रंग-बिरंगे फूल और बागीचे। अब तो सड़क पर गिनकर चार-पाँच पेड़ ही दिखते हैं। 
अपने घर आते वक़्त मौसी मुझे सौ रूपये देती थीं। पर मेरे बड़े होते-होते उन्होंने पैसे के नोटों को कपड़े-चॉकलेट में बदल दिया, पर मुझे पसंद था उन नोटों से अपने गुल्लक को भरना, फिर साल भर मम्मी से लड़कर उसे बहन की भूल बताकर तोड़ देना।
खैर अब कहाँ किसी के पास इतना वक़्त रह गया है। सर्दियों में मैं तेल की शीशी लेकर छत पर भाग जाती थी, और माँ से तेल लगवाते हुए, सूखने रखे पापड़ कच्चे ही खा जाती थी। बगल में रखी आम के आचार की बरनी में से सरसों के तेल की भीनी-भीनी खुशबू मैं आज तक नहीं भूली। दादी अमरूद काटकर नमक डालकर सर्दियों की धूप में,स्टील की प्लेट में रखकर लाती थीं,यह उनके और मेरे रिश्ते को सहेजना का एक बहाना था। पर अब घर के पांच सदस्य पांच मीठी बात भी आपस में बोल लें तो बड़ी बात होगी, घंटो बहस ज़रूर होती है मोदी जी का भाषण पर, आई.एस.आई.एस की बर्बता भरी हरकतों को सुनकर मन विचलित भी हो उठता है ,पर अपने घर के मुददों पर कोई बात नहीं करना चाहता। बचपन में मेरी गलियों में टुन -टुन वाले का इंतज़ार हर बच्चे को रहता था। पहिए वाले ठेले पर १५-२० खानों में अलग-अलग चीज़ें रखकर लाता था वो, खट्टी-मीठी गोलियॉं, लड्डू , आम-पापड़ और न जाने क्या-क्या, मुझे याद ही नहीं कि उसने कभी पैसों का हिसाब लिया हो। कई बच्चे तो मुफ़्त में ही लुफ़्त उठा लिया करते थे। पर अब गाड़ियों के शोर ने उन ठेलों की आवाज़ को कम कर दिया है। अब तो बरसात के दिनों की चाट-पकौड़ी भी सील बंद डब्बों में रेडीमेट आती है जिस पर बड़ा-बड़ा लिखा होता है "रेडी टू ईट ",बस खाते जाइए साथ-साथ ढेरों चैनलों की फेर-बदल करते जाइए। जंगल-बुक, विक्रम-वेताल, रामायण की जगह २४ घण्टे मेकअप से पुते चेहरों के सीरीयल आते रहते हैं। 
और यदि टी.वी से कुछ वक़्त मिला तो फेसबुक ने दामन थाम लिया,जिसमें कुछ पहचान के मिल जाते हैं , कुछ से दोस्ती हो जाती है। कैसी अज़ीब दुनिया है यह ? कॉलेज-हैंगआउट , गाँव का चबूतरा , कॉफी-शॉप का अड्डा , सब न जाने कहाँ गुम हो गया है। मुझे शिकायत नहीं बदलते वक़्त से पर शिकायत है उस दौर से जिसने कुछ अच्छी चीज़ें बदल दी हैं। वो वक़्त फिर से आ जाए तो शायद फिर एक बार सरल हो जाए जीवन और रिश्ते बन जाएँ आसान। 

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