रंगों का ताल-नैनिताल-
चार दिन के मेरे नैनिताल के सफर ने मुझे बहुत सारी नई
भावनाओं से अवगत करवाया.पत्रकारिता पेशा होने के कारण खोज-बीन स्वभाव में ही ढल गई है.स्टेशन पर आर.के नारायण की कहानी-संग्रह खरीदकर मन खिल उठा.ट्रेन का सफर उस किताब के सहारे कट रहा था,तभी कुछ आवाज़
ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा.एक अपाहिज लड़का ट्रेन का फर्श साफ
करके पैसे कमा रहा था.वह भी माँगकर नहीं जिसकी इच्छा हो वह दे
अथवा नही.
नैनिताल पहुँचकर वहाँ के सौन्दर्य की जीतनी
तारीफ़ करुँ उतनी कम है.हरी-भरी वादीयाँ,वादीयों के बीच झरने,झरनों को खोलते अनेक ताल.हम शहरवासियों के लिए यह नज़ारा अदभुत था.बारिश से भीगे
पहाड़ों पर ओस की बूँदें उनका श्रंगार करती नज़र आ रही थी.ऐसे बारिश के दिनों में माल रोड पर गरम-गरम पकौड़े कौन
नहीं खाना चाहेगा.और र्सिफ पकौड़े ही क्यों,
बस आगे बढ़ते जाइये साथ ही भुट्टे,चाट,मसालेदार चाय,कचौड़ी का लुफ्त उठाते जाइये.जैसा कि मैंने पहले कहा था,एसे द्रश्य पर अनेक लेख भी कम होंगे.यह सब तो आपने बहुत बार किताबों,कहानियों में सुना होगा पर मैंने सौन्दर्य के अनेक रंगों
में एक अलग ही रंग महसूस किया,वह था अपनों के साथ का रंग.शादी के बाद हनीमून पर आया एक जोड़ा बहुत खुश है एक-दूसरे
का साथ पाकर.मज़ेदार बात तो यह है कि पती अपनी पत्नी पर जी भरकर
पैसे खच कर रहा है,शायद यह उनकी जिन्दगी का एकलौता एसा पल हो :):):).वहीं दूसरी
जोड़ा एसा भी है जो अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ छुट्टियाँ मनाने
आया है.वैसे तो छोटा बच्चा अपनी माँ की गोद में दिखता है पर एसी
जगहों पर माँ के हाथों में शॉपिंग बैग दिखते हैं और पिता
मात्र बेबीसिटर जैसे दिखाई देते हैं :):):).कुछ लोग तो मात्र प्रकति
के साथ अपनी अदभुत तसवीरें खींचाने में लगे हैं.कुछ लोग एसे भी हैं जो इन्हीं पर्यटकों
से अपनी कमाई की आस से दुकाने खोले बैठे हैं.सर्दी,गर्मी,बारिश में यह लोग ग्राहकों
के आने का इंतज़ार करतें हैं.उनकी आँखों में निराशा देखती हूँ जब लोग उन्हें नज़रअंदाज
करके आगे बढ़ जातें हैं.फिर भी यह खट्टे-मिट्ठे रिश्तों का मेला है,जो प्रकति के अनेक
रंगों में कहीं गायब सा हो जाता है. 
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