ज़िम्मेदारी
या सपने-
पेप्सिको
की भारतीय महिला सीईओ इंद्रा नूयी एक सफल महिला होते हुए कामकाजी महिलाओं की
तकलीफें बताते हुए कहा है की ऑफिस के काम में और घर में बैलेंस बनाना मुश्किल है। उन्होंने अपनी निजी ज़िन्दगी के बारे
में बताते हुए कहा है की पति के साथ अपनी दोनों बेटियों को पालते वक़्त उन्हें कई
बार अपराध-बोध होना पड़ा है। छुट्टियां न मिलने के कारण वह अपने पति और बेटियों को समय नहीं दे
पाती थीं पर धीरे-धीरे वह इस स्थिति से निपटना सीख गई। उन्होंने इस बात पर भी संदेह जताया है
की उनकी बेटियां उन्हें अच्छी माँ मानती हैं। नूयी कहती हैं की “आप सब कुछ हासिल नहीं कर सकते। आपको हर वक़्त मुकाबला करना होता है क्योंकि आप अपराध-बोध से मर रहे होते
हैं।
वहीँ
दूसरी ओर फेसबुक की सीईओ शेरिल सैंडबर्ग बताती हैं की "मेरी बेटी ने पूछा की
अगर मैं और मेरे हस्बैंड एस्ट्रोनॉट बनना चाहे
तो? मैंने
कहा ठीक रहेगा। इस
पर वो बोली कि ऐसी कंडीशन में बच्चों का ख्याल रखने के लिए मुझे घर पर ही रहना
होगा।
हम ऐसे काम बस महिलाओं के हिस्से में
मानकर चलते हैं। इसलिए
हम स्टीरियोटाइप बन चुकी महिलाओं को अपना नजरिया बदलना चाहिए। साथ ही जिसमे कुछ सीखने की क्षमता और
जिज्ञासा होती है वही लीडर बनता है। यह सब बातें जेंडर के आधार पर नहीं बल्कि
क्षमता के आधार पर होना चाहिए। इसके बावजूद भी महिलाओं को दुनियाभर में सेम काम
के लिए कम पैसे दिए जाते हैं।“
इन
दोनों महिलाओं की बातों पर गौर किया जाये तो मसला यह है की एक तरफ हम महिलाओं
की शिक्षा पर धयान दे रहे है,नौकरी के लिए बढ़ावा दे रहे है वहीं दूसरी ओर उनकी नौकरी और घर की ज़िम्मेदारी
को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। ऐसे में इस परेशानी का हल निकालना बहुत ज़रूरी है।

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