Monday, 7 July 2014



बीते दिनों की याद-

मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी तो देखा सात बज गए,आज उठने में देर हो गयी मुझे. फ़ोन पर थी मेरी पुरानी दोस्त छाया.आज इतने दिनों बाद फ़ोन आया उसका, मैं तो बहुत खुश हो गयी. उसने बतया की वह लखनऊ आई हुई है और मुझसे मिलना चाहती है फिर क्या था बना लिया फटाफट मिलने का प्रोग्रामबहुत दिन बाद पुराने दोस्त से मिलने का अनुभव भी अदभुत होता हैशाम को उससे मिलकर बहुत सारी पुरानी खट्टी-मीठी यादें ताज़ा हुईं जब हम बचपन के दिनों को याद करते हैं तब यह एहसास होता है की हमारी ज़िन्दगी से बचपन जाने का कारण था औपचारिकताएँ और अच्छे-बुरे का विचार बचपन कोई उम्र नहीं हैं,यह तो वह स्टेज है जहाँ इंसान का मन बहुत निर्मल होता हैआज तो कुछ खाने से पहले भी यह सोचना पड़ता है की पर्स में पैसे कितने हैंखैर दिन बहुत अच्छा रहाचाट-पकौड़ी का लुफ्त उठाकर मैं घर आ गई

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