वक़्त की परीक्षा-
बच्चों
के स्कूल खुलते ही स्कूलों की रौनक लौट आई। कुछ बच्चे नई क्लास में जाने के लिए उत्सुक थे तो कुछ नए स्कूल को लेके थोड़े परेशान दिखे। बच्चों की सोच पढ़ाई को लेके भले ही अलग-अलग हो पर स्कूल के नियम -कानून सबके लिए एक बराबर है। आज के वक़्त में जहाँ एक-एक सेकंड की कीमत बहुत है वहाँ स्कूल के लम्बे टाइमिंग्स बच्चों को थोड़ी तकलीफ में डाल देते हैं इसलिए ज़रूरी है स्कूल प्रशासन इस बात को लेके स्ट्रिक्ट एक्शन ले। यह कहना तो गलत होगा की क्लासेज कम कर दी जाएँ पर एक-एक घंटे की क्लास में न बच्चे ध्यान दे पाते हैं और न टीचर के लिए एक घंटे पढ़ा पाना मुमकिन है। और कुछ क्लासेज का तो कोई मतलब ही नहीं होता-जीरो
पीरियड,लाइब्रेरी क्लास, इन सब क्लासेज का वक़्त कम करके छुट्टी जल्दी की जा सकती है।
दसवीं, बारवीं के छात्र तो कोचिंग भी ज्वाइन करते हैं। स्कूल और कोचिंग में तालमेल
बिठा पाना बच्चों के लिए काफी मुश्किल साबित होता है,ऐसे में सेल्फ स्टडी का वक़्त बच्चों
को नहीं मिल पता। सेल्फ टाइम निकलना तो दूर की बात है। प्रशासन इसके लिए नियम में बदलाव
ला सकता है तभी हालात में सुधार संभव है।

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